<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-14341775</id><updated>2011-04-21T12:33:53.121-07:00</updated><title type='text'>prapanchatantra</title><subtitle type='html'>satire stories</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://prapanchtantra.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/14341775/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://prapanchtantra.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>alokpuranik</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02765351960880619893</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>1</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-14341775.post-113734705845351833</id><published>2006-01-15T09:42:00.000-08:00</published><updated>2006-01-15T09:44:18.463-08:00</updated><title type='text'></title><content type='html'>प्रपंचतंत्र कथा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;टपकाओ उर्फ ट्रिकल डाऊन थ्योरी&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;चालूचक्रम नगर की चतुरा कंपनी में तीन अधिकारी कार्य करते थे-सींचू, भींचू और टपकंचू।&lt;br /&gt; इन सबके अपाइटमेंट का समय  लगभग एक ही था। तीनों ही अपने हिसाब से काम करने में लगे हुए थे। सींचू की आदत थी कि वह कंपनी में नये-नये चेले बनाता था। उन्हे सींचता था, उन पर बहुत मेहनत करता था और उन्हे अपना सारा ज्ञान दे देता था। जैसे ही चेलों को पता लगता कि सींचू गुरु ने उन्हे सारा ज्ञान दे दिया है, चेले कहीं और टहल लेते थे। इस तरह से सींचू के पास कभी सालिड नेटवर्क नहीं हो पाया। वह नये चेले तैयार करता, कुछ समय बाद वह उसके पास से टहल लेते।&lt;br /&gt;सींचू बहुत परेशान हो गया, क्योंकि किसी भी सामान्य कंपनी की तरह इस कंपनी में भी प्रोग्रेस उसी की होती थी, जिसके चाहे जैसे काम-धंधे चाहे जैसे हों, पर टाप पर बंदे जरुर हों।&lt;br /&gt;सिर्फ टाप पर ही नहीं हों, मिडिल लेवल और डाऊन लेवल पर हों।&lt;br /&gt; वह जानता था कि आजकल टाप,मिडिल और डाऊन लेवल –हर लेवल की रणनीतियां अपनाने वाले को ही प्रमोशन मिलता है। इसके लिए जरुरी है कि डाऊन लेवल पर अपने समर्थक चपरासी प्रतिद्वंदी बंदों के बारे अफवाह फैलायें कि फलां दारु बहुत पीता है, फलां जुआ बहुत खेलता है।&lt;br /&gt;मिडिल लेवल के अपने बंदों को चाहिए कि वो प्रतिद्वंदियों की फाइलों को चलने ही न दे। और टाप पर लेवल बैठे अपने बंदों का कर्तव्य़ है कि वो मीटिंग में प्रतिद्वंदियों के नाम की चर्चा होने ही न दें।  पर सींचू का मामला जमता ही नहीं था, बंदे उसके हो ही नहीं पाते थे।&lt;br /&gt;भींचू की समस्या भी यही थी कि बंदे उसके हो ही नहीं पाते थे। भींचू जिसे भी चेला-चमचा बनाते थे, वह कुछ ही टाइम बाद टहल लेता था, यह आरोप लगाते हुए कि भींचू अपने चेलों को कुछ देता नहीं है। सब कुछ अपने पास ही भींच कर रखता है। जैसे उसे दफ्तर में मेहमानों को चाय-वगैरह पिलाने के लिए जो इंटरनेटमेंट एलाउंस मिलता है, वो सारा की सारा वह खुद ही खा-पी लेता है, चेलों को उसमें से एक कप चाय तक नहीं मिलती। ऐसी चमचागिरी का क्या फायदा, जिसमें कुछ भी रिटर्न ना हो।&lt;br /&gt;पर टपकंचू का मामला एकैदम टनाटन था। टाप से लेकर डाऊन लेवल तक उसके बंदे थे, उसके तमाम तरह के धंधे थे। एक बार दफ्तर में प्रमोशन-प्रक्रिया शुरु हुई। सब पीछे रह गये, टपकंचू टाप पोजीशन पर पहुंच गया।&lt;br /&gt;      सींचू और भींचू दोनों ने टपकंचू से प्रश्न किया-हे मित्र किस विधि तुम टाप टू डाऊन लेवल पर बंदों को कैसे सैट करते हो।&lt;br /&gt;      टपकंचू ने बताया-देखो, जिस तरह से देश की पालिटिक्स में मध्यमार्गियों की मौज होती है, उसी तरह से दफ्तर की पालिटिक्स में भी मध्यमार्गी की विजय होती है। देश की पालिटिक्स में मध्यमार्गियों की मौज होती है, वो कभी भी किधर भी छलांग मार सकते हैं। इसी को फालो करते हुए दफ्तर में करना यह चाहिए कि कभी चेले-चमचों को फुलमफुल सींचना नहीं चाहिए। उन्हे सब कुछ आफर नहीं करना चाहिए। जिस क्षण चेलों को लगता है कि अब सिंचन-प्रक्रिया संपन्न हो चुकी है, तो वह टहलायमान हो जाते हैं। सो सींचू तुम तो यूं फ्लाप हुए कि तुमने फुलमफुल सिंचन प्रक्रिया अपनायी।&lt;br /&gt;      और भींचू तुम इसलिए फ्लाप हुए कि तुमने बिलकुल ही भींचन प्रक्रिया अपनायी। अरे किसी को कुछ नहीं मिलेगा, तो कोई चमचागिरी क्यों करेगा। बिना रिटर्न की उम्मीद के तो समझदार&lt;br /&gt;                                                                     1&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसी से प्यार तक नहीं करते। सो भींचू, सफलता का राज न फुलमफुल देने में है, न भींचने में है। सफलता टपकऊल यानी ट्रिकल डाउन के सिद्धांत में है। यानी थोड़ा सा टपकाते रहना चाहिए, पर पूरे फल को दूर रखना चाहिए। फल लागे अति दूर के सिद्धांत को यूं समझना चाहिए कि कुछ न देने वाली सिर्फ कांटों की झाड़ियों के पास कोई नहीं जाता। और बहुत नीची ऊंचाई वाले अमरुद के पेड़ को पब्लिक एक झटके में खाली कर देती है। पर खजूर का पेड़ एकदम सेफ सी स्थिति में रहता है। उस तक पहुंचने की आस कई लगाते हैं, और उनमें से कुछ को फल मिलते भी हैं।&lt;br /&gt;      टपकंचू के ऐसे वचन सुनकर सींचू और भींचू दोनों ने कहा-आगे से हम भी ट्रिकल डाऊन और टपकाऊ सिद्धांत पर कार्य करेंगे।&lt;br /&gt;     &lt;br /&gt;      बास से दूर यानी फल लागे अति दूर&lt;br /&gt;चतुरा कंपनी में ही नीयरू और टहलू नामक दो बंदे काम करते थे।&lt;br /&gt;नीयरु बास के नीयर करीब रहकर हेडक्वार्टर में ही बने रहना चाहता था, जबकि टहलू का मानना था कि जीवन का उद्देश्य सिर्फ बास के करीब रहना नहीं है, जीवन का उद्देश्य है माल पैदा करना। बास तो क्षणभंगुर नहीं तो महीनाभंगुर या सालभंगुर होता है। पर एक बार कायदे से माल पैदा कर लिया जाये, तो पूरी जिंदगी का जुगाड़मेंट हो जाता है।&lt;br /&gt;नीयरू ने ऐसी सैटिंग-गैटिंग की, बास ने उन्हे हमेशा अपने साथ हेडक्वार्टर में रखने की कोशिश की। नीयरु बास के साथ कार में घूमने और बास को चुटकुले सुनाते हुए अत्यधिक गौरवान्वित महसूस करता था। उधर टहलू का ट्रांसफर हेडक्वार्टर से दूर एक दूरस्थ नगर में कर दिया गया।&lt;br /&gt;टहलू ने हेडक्वार्टर की नजर से दूर डीलरों से कमीशन लेना शुरु किया और टनाटन रकम पैदा की, कुछ ही समय में टहलू ने इस रकम से एक पेट्रोल पंप बना लिया और चैन से जिंदगी बसर करने लगा। उधर हेडक्वार्टर में पुराने बास का ट्रांसफर हो गया और नया बास अपने नये खास लेकर आया। बेचारा नीयरु अपने पुराने चुटकुलों के साथ हेडक्वार्टर के पुराने गोदाम में ट्रांसफर कर दिया गया।&lt;br /&gt;टहलू एक बार हेडक्वार्टर आया और उसने नीयरु की दुर्गति देखी और फिर बताया कि हेडक्वार्टर से दूर रहकर उसने कैसी मौज की है।&lt;br /&gt; टहलू ने बताया-देखो, हेडक्वार्टर में रहकर सिर्फ बास की करीबी हासिल होती है। और बास की करीबी से सबको कुछ हासिल नहीं होता है। अगर कुछ हासिल नहीं होना है, तो बास की करीबी हो या दूरी बेकार है। सो बंदे का फोकस क्लियर होना चाहिए। फोकस होना चाहिए कि माल कैसे पीटा जाये। कई बार माल हेडक्वार्टर से दूर ही कमाया जाता है। सो हेडक्वार्टर में बास के करीब रहने के चक्कर में समझदारों को नहीं पड़ना चाहिए।&lt;br /&gt;शिक्षाएं-1-न तो चेलों को झमाझम सींचना चाहिए, न ही उन्हे पूरा भींचना चाहिए। मामला बैलेंस का होना चाहिए।&lt;br /&gt;     2-टपकऊल थ्योरी दफ्तर की पालिटिक्स में बहुत काम की होती है।&lt;br /&gt;    3- जीवन का उद्देश्य सिर्फ बास के करीब रहना नहीं है, जीवन का उद्देश्य है माल पैदा करना। बास तो क्षणभंगुर नहीं तो महीनाभंगुर या सालभंगुर होता है। पर एक बार कायदे से माल पैदा कर लिया जाये, तो पूरी जिंदगी का जुगाड़मेंट हो जाता है।&lt;br /&gt;   4- कई बार माल हेडक्वार्टर से दूर ही कमाया जाता है। सो हेडक्वार्टर में बास के करीब रहने के चक्कर में समझदारों को नहीं पड़ना चाहिए।&lt;br /&gt;                        &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;      &lt;span style="font-size:130%;"&gt;प्रपंचतंत्र कथा-भाई जैसे और बेटे जैसे  की कहानी&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;      नोटवर्धन नगर में प्रेक्टीकू और इमोशू नामक दो कर्मचारी नोटदाबू कंपनी में काम करते थे।&lt;br /&gt;      प्रेक्टीकू एकदम प्रेक्टीकल किस्म का बंदा था।&lt;br /&gt;वह मानकर चलता था कि इस धरती पर जो भी कुछ होता है, वह किसी न किसी मतलब से ही होता है।&lt;br /&gt; सूरज निकलता है, तो जरुर बल्बों की कंपटीशन से घबरा कर निकलता है कि कहीं ऐसा न हो, कि एक दिन बल्बों के सामने लोग उसे भूल न जायें।&lt;br /&gt;चंद्रमा निकलता है, तो जरुर इस डर से  कि अगर नहीं निकला, तो उसका टीए डीए कट जायेगा। कोई नदी बहती है, तो सिर्फ इसलिए कि उसकी पूजा हो सके और लोग उसमें पैसे डाल सकें।&lt;br /&gt;हवा चलती है, तो सिर्फ इसलिए कि वह जरुर किसी पंखे या कूलर की माडलिंग करती है।&lt;br /&gt;यानी कुल मिलाकर इस जीवन-जगत में जो भी होता है, वह किसी न किसी मतलब से होता है।&lt;br /&gt;      पर इमोटू एक इमोशनल किस्म का बंदा था।&lt;br /&gt;वह मानता था कि इंसानों और गधों में फर्क यही होता है कि गधे इमोशनल होते हैं, और अपने बास के प्रति मुहब्बत का भाव रखते हैं। ऐसा ही भाव अपने बास के प्रति रखना चाहिए, ऐसा वह सबसे कहता था।&lt;br /&gt;इमोटू कहता था कि उसके रिश्ते ही सब कुछ  हैं, जो आपको भाई माने, उसके लिए जान भी लगा देनी चाहिए।&lt;br /&gt;      भाई उर्फ शेयर बाजार&lt;br /&gt;      सो इसी प्रकार अपने बास की बिना छुट्टी लिये सेवा करने वाला इमोटू बराबर अपने बास को भाई मानता रहा और प्रत्युत्तर में भाई माना जाता रहा। कालांतर में इमोटू के बालक-बच्चे बड़े हुए, उन पर ध्यान देने के लिए कभी-कभार वह दफ्तर से घर भी आने लगा।&lt;br /&gt; ऐसे मौकों पर बास की बीबी के सम्मुख सवाल उठा कि घर की सब्जी कौन लेकर आयेगा।&lt;br /&gt; मुन्नू को मेले में कौन ले जायेगा।&lt;br /&gt;टामी को सांध्यकालीन पार्क-भ्रमण कौन करवायेगा।&lt;br /&gt; इमोटू के बच्चे जैसे-जैसे बड़े होते गये, बास के घर से उसकी अनुपस्थिति बढ़ती चली गयी।&lt;br /&gt;      एक दिन बास ने उसे बताया कि अब इमोटू की सेवाओं की जरुरत कंपनी को नहीं है, उसके बदले एक बंदा इमोटू की सेलरी की आधी सेलरी में रख लिया गया है।&lt;br /&gt;      इमोटू ने देखा कि नया बंदा घर और दफ्तर दोनों का काम उसी तेजी से कर रहा है, जिस तेजी से इमोटू अपनी नौजवानी के दिनों में करता था।&lt;br /&gt;इमोटू ने बास से कहा-आप तो मुझे छोटा भाई मानते थे, और अब मुझे बाहर कर रहे हैं।&lt;br /&gt;इस बार बास ने बताया कि वह तो अपने छोटे भाई को भी घर से बेदखल कर चुके हैं।&lt;br /&gt;      इमोटू दफ्तर की सीढ़ियों पर फूट-फूटकर रोने लगा।&lt;br /&gt;      उसे रोता देखकर प्रेक्टीकू उसके सामने आया और बोला-&lt;br /&gt;इमोटू तूने इमोशन के चक्कर में अपनी बुद्धि इतनी मोटी कर ली कि तुझे कुछ अच्छी और सच्ची बातें सूझी ही नहीं। अरे बेवकूफ, जिस प्रकार शेयर बाजार में तमाम शेयर तमाम वजहों से ऊपर नीचे होते रहते हैं, उसी तरह से भाईगिरी के बाजार में भाईयों के भाव ऊपर-नीचे होते रहते हैं।&lt;br /&gt;दफ्तर-गीता के मुताबिक दफ्तर में कोई किसी का भाई नहीं है, कोई किसी का बाप नहीं है।&lt;br /&gt;सब के सब से यूं ही मेल हैं, अपने-अपने खेल हैं।&lt;br /&gt; जिस तरह आत्मा एक शरीर छोड़कर दूसरे शरीर को पकड़ लेती है, उसी तरह से बास मौका आने पर एक भाई को छोड़कर दूसरे भाई को पकड़ लेता है।&lt;br /&gt;छूटा हुआ भाई अगर अपने लिए दूसरा जुगाड़ नहीं बना पाता, तो यह उसकी मूर्खता है, और मूर्खों का भला कर पाना उसी तरह से मुश्किल है, जिस तरह से नगर निगम के नल के पानी का आना।&lt;br /&gt;      प्रेक्टीकू के ऐसे वचन सुनकर इमोटू बोला-हे मित्र, मुझे अब समझ में आ गया है कि बास अगर भाई माने, तो भी दूसरे भाईयों से सैटिंग, गैटिंग में लगे रहना चाहिए। पता नहीं, कौन कब भाई गोली दे जाये।&lt;br /&gt;      पैसा सच है, रिश्ते फानी&lt;br /&gt;      नोटू और रिश्तू नामक दो कर्मचारी नोट खेंचू कंपनी में काम करते थे।&lt;br /&gt;      एक दिवस बास ने दोनों को पचास लाख के कैश कलेक्शन के लिए भेजा।&lt;br /&gt;      कलेक्शन करने के बाद दोनों वापस आ रहे थे कि नोटू ने प्रस्ताव किया-&lt;br /&gt;हे मित्र इस रकम में आधी-आधी पार करते हैं और इस शहर की हद से पार हो जाते हैं।&lt;br /&gt;      इस पर रिश्तू ने कहा-नहीं, यह बास तो हम पर बेटों की तरह विश्वास करता है। यह तो हमारे बाप की तरह है।&lt;br /&gt;      इस पर नोटू ने कहा-अरे बेवकूफ, कोई भी समझदार अपने बेटों पर विश्वास नहीं करता और कोई समझदार बेटा अपने बाप का विश्वास नहीं करता। तूने इतिहास नहीं पढ़ा क्या, बता अगर औरंगजेब अपने बाप शाहजहां को गोली देकर उसे कैद करके सत्ता नहीं हथियाता, तो बता क्या औरंगजेब का नाम कोई इतिहास में जानता भी क्या। नहीं ना, बता क्या तुझे औरंगजेब के और भाईयों के नाम पता भी हैं कि शाहजहां के एक बेटे का नाम दारा था कि मुराद था। बेटा इतिहास में उनके ही नाम जाते हैं, जो अपने बाप को गोली देने की कला जानते हैं। मैं तो भाग रहा हूं, अपने हिस्से की रकम लेकर, अपने हिस्से की रकम लेकर तू चाहे तो वापस चला जा।&lt;br /&gt;      नोटू रकम लेकर भाग गया और कालांतर में दूसरे शहर में नेतागिरी और नकली दारु का कारोबार करते हुए अत्यधिक ही संपन्न हुआ और मंत्री बनकर सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करने लगा। पर रिश्तू रिश्तों का लिहाज करते हुए वापस कंपनी में आ गया। उक्त घटना के पांच साल बाद नोटखेंचू कंपनी के मालिक की जगह नये बेटों ने टेकओवर किया। उन्होने आते ही कास्टकटिंग के तहत पचास साल से पुराने सारे कर्मचारियों को रिटायर कर दिया। रिश्तू भी रिटायर कर दिया गया, रिश्तू रोते-रोते हुए गया पुराने मालिक के पास। पुराने मालिक ने कहा-मैं नये बेटों के मामले में कुछ नहीं कर सकता, पुरानी सेवाओं के बदले में मैं सिर्फ इतना कह सकता हूं कि आज रात का खाना मेरे घर ही खाकर जाना।&lt;br /&gt;      ऐसा सुनकर रिश्तू ने कहा मुझे अब शिक्षा मिली है कि समझदार बेटे अपने बाप को गोली देते हैं, जैसे नोटू ने आपको दी थी।&lt;br /&gt;      शिक्षाएं-1-जिस तरह आत्मा एक शरीर छोड़कर दूसरे शरीर को पकड़ लेती है, उसी तरह से बास मौका आने पर एक भाई को छोड़कर दूसरे भाई को पकड़ लेता है। छूटा हुआ भाई अगर अपने लिए दूसरा जुगाड़ नहीं बना पाता, तो यह उसकी मूर्खता है, और मूर्खों का भला कर पाना उसी तरह से मुश्किल है, जिस तरह से नगर निगम के नल के पानी का आना।&lt;br /&gt;2-अगर औरंगजेब अपने बाप शाहजहां को गोली देकर उसे कैद करके सत्ता नहीं हथियाता, तो बताइए क्या औरंगजेब का नाम कोई इतिहास में जानता भी क्या।&lt;br /&gt;           &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-size:130%;"&gt;प्रपंचतंत्र कथा-बेवकूफी के फायदे&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;                 &lt;br /&gt;      एक समय की बात है, एक दफ्तर में दो बंदे काम करते थे-एक था तीक्ष्णबुद्धि और दूसरा था, अतितीक्ष्णबुद्धि। तीक्ष्णबुद्धि बहुत ही तेज बुद्धि का बंदा था। उसका आईक्यू लेवल बहुत हाई था। तीक्ष्णबुद्धि की बुद्धि इतनी तीक्ष्ण थी कि वह किसी भी बंदे के एक्शन का फौरन विश्लेषण कर देता था। वह इतना ज्यादा पढ़ता था कि उसके सारे सहकर्मी इस बात को जानते थे और मानते थे कि उस जैसा पढ़ाकू और कोई और नहीं है।&lt;br /&gt;      अतितीक्ष्णबुद्धि का हिसाब-किताब अपने नाम के विपरीत था। ना तो इतना पढ़ता था, ना ही उसकी बुद्धि बहुत तीक्ष्ण थी। अतितीक्ष्ण तो क्या, उसमें बुद्धि थी भी या नहीं, इस तरह के प्रश्न उसे देखकर तीक्ष्णबुद्धि अकसर उठाया करता था।&lt;br /&gt;      तीक्ष्णबुद्धि की बुद्धि का आलम यह था कि वह अपने दफ्तर के सारे बंदों के एक्शन देखकर उसके पीछे के खेल समझ लेता था। एक बार उसके इमीडियेट बास ने एक मीटिंग में उससे कहा कि जीवन में कला का बहुत महत्व है। हमें एक कला प्रदर्शनी आयोजित करनी चाहिए।&lt;br /&gt;      बास के ऐसे वचन सुनकर तीक्ष्णबुद्धि ने जुमला कसा-क्यों सुपर बास की बीबी आजकल पेंटिंग करने लगी हैं क्या, जो आपको कला प्रदर्शनी की चिंता सताने लगी।&lt;br /&gt;      बास अपना सा मुंह लेकर रह गया। मीटिंग में लोग हो हो करके हंसने लगे।&lt;br /&gt;      बात सही थी और यही थी कि बास मक्खनबाजी की परियोजना के तहत अपने सुपरबास की बीबी को  देश की प्रख्यात पेंटर साबित करना चाहता था।&lt;br /&gt;      पर बास खुली मीटिंग में अपनी पोल इस तरह से खुलते देखकर परेशान हो गया।&lt;br /&gt;      कुछ समय बाद एक मीटिंग में बास ने प्रस्ताव किया कि हमें अपने कर्मचारियों के बच्चों की प्रतिभा को बढ़ावा देना चाहिए। इसके तरह हमें गायन प्रतियोगिता आयोजित करनी चाहिए।&lt;br /&gt;      फौरन से तीक्ष्णबुद्धि ने कहा-लगता है कि सुपरबास के बच्चे गाना गाना सीख रहे हैं।&lt;br /&gt;      बात सही थी और यही थी।&lt;br /&gt;      अगली बार से बास ने तीक्ष्णबुद्धि को मीटिंग में बुलाना ही बंद कर दिया।&lt;br /&gt;      इसके बाद अतितीक्ष्णबुद्धि ने ऐसे मौके पर एक मीटिंग में बास को सुझाव दिया-सर, आप पूरे दफ्तर के लिए इतना चिंतित रहते हैं और साथ में साहित्यसाधना भी करते हैं।&lt;br /&gt;      बास ने कहा-मैं और साहित्यसाधना, ऐसा तो मैंने कभी नहीं किया।&lt;br /&gt;      इस पर तीक्ष्णबुद्धि ने कहा-सर आप रोज उपन्यास लिखते हैं, उपन्यास का नाम है-मौन।&lt;br /&gt;      जब आप दफ्तर में किसी को डांट नहीं रहे होते हैं या किसी फाइल पर दस्तखत नहीं कर रहे होते हैं, तो आप मौन होते हैं। आपका मौन ऐसा-वैसा मौन नहीं है। इसमें भारी अर्थ हैं। इसके आगे तो बड़ा सा बड़ा साहित्य व्यर्थ है। आपके मौन में कई आयाम हैं। आपका मौन बोलता है। साहित्य के कई नये अर्थ खोलता है। आपका मौन ही असली साहित्य है, इसके आगे बताओ कौन है। इसे हम नमन करते हैं।&lt;br /&gt;      बास शरमाये।&lt;br /&gt;      अगर आप हमाऱी छोटी सी भेंट कबूल नहीं करेंगे, तो हम आपके उपन्यास सुनने के लिए दफ्तर का सारा काम रोक देंगे-ऐसी धमकी देते हुए अतितीक्ष्णबुद्धि ने झुककर बास को अत्यधिक ही नम्र प्रणाम किया।&lt;br /&gt;      ऐसा कहकर एक बहुत ही शानदार शाल अतितीक्ष्णबुद्धि ने बास को पेश किया।&lt;br /&gt;      बास ने शरमाते हुए वह शाल ग्रहण किया। कहना अनावश्यक है कि तीक्ष्णबुद्धि ने इस शाल की कीमत दफ्तर के हर कर्मचारी से वसूली थी।&lt;br /&gt;      कालांतर में अतितीक्ष्णबुद्धि को बास ने उन दौरों पर भेजना शुरु किया, जिनके बारे में माना जाता था कि  उनमें हजारों का टीए, डीए बनता है।&lt;br /&gt;      उधर तीक्ष्णबुद्धि के बारे में दफ्तर में खबर फैल चुकी थी कि बास उसे बैठकों में नहीं बुलाते। इस वजह से तीक्ष्णबुद्धि का भाव दफ्तर में बहुत तेजी से गिर गया।&lt;br /&gt;      एक दिन तीक्ष्णबुद्धि दफ्तर में इस मसले पर विचार कर रहा था कि वह इतना पढ़ता है, तमाम बंदों के एक्शन के बारे में उसे पहले ही पता चल जाता है। फिर भी वह वहीं का वहीं है। जबकि अतितीक्ष्णबुद्धि में ऐसा कुछ भी नहीं है, फिर भी वह धुआंधार प्रोग्रेस किये जा रहा है।&lt;br /&gt;      ऐसा विचार करते हुए उसने चपरासी से पानी लाने को कहा।&lt;br /&gt;      चपरासी ने पानी लाने से इनकार कर दिया। कहना  अनावश्यक है कि बास ने ही चपरासी को मना कर रखा था-कि तीक्ष्णबुद्धि की किसी बात को सुनने से इंकार कर देना। उसके लिए पानी भी मत लाना।&lt;br /&gt;      चपरासी के ऐसे व्यवहार की शिकायत करने जब तीक्ष्णबुद्धि बास के पास गया, तो बास ने कहा-हे तीक्ष्णबुद्धि जब तुझसे एक चपरासी तक नहीं संभलता, तो दफ्तर का बाकी कामकाज तुझसे कैसे संभलेगा। तू तो दफ्तर के कामकाज के बिलकुल अयोग्य़ है।&lt;br /&gt;      ऐसा अपमान सुनकर तीक्ष्णबुद्धि ने फौरन दफ्तर की नौकरी से इस्तीफा दे दिया। .&lt;br /&gt;      इस्तीफा देकर जैसे ही तीक्ष्णबुद्धि दफ्तर के गेट से बाहर निकला, तो सामने से अतितीक्ष्णबुद्धि विदेशी दौरों से लौटकर आ रहा था। उसे देख कर तीक्ष्णबुद्धि ने कहा-हे मित्र मैं तुझसे ज्यादा तीक्ष्णबुद्धि हूं, पर तू मुझसे ज्यादा मौज में है। व्हाई, बताओ।&lt;br /&gt;      इस पर तीक्ष्णबुद्धि ने कहा-&lt;br /&gt;      मित्र दुनिया में सब कुछ बुद्धि से नहीं होता। बेवकूफी के रिटर्न कई बार बुद्धि के रिटर्न से ज्यादा होते हैं। देख समझने की कोशिश कर, जहां पर बेवकूफी के रिटर्न ज्यादा हों, वहां असली बुद्धिमानी बेवकूफी दिखाने में है। सो समझदार मौका-मुकाम देखकर परम बेवकूफ बनने में ही सबसे ज्यादा अक्लमंदी है। तेरी बुद्धिमानी के रिजल्ट क्या आये, तूने देखे और मेरी बेवकूफी के रिजल्ट क्या आये, यह भी तूने देखे।&lt;br /&gt;      अतितीक्ष्णबुद्धि के ऐसे वचन सुनकर तीक्ष्णबुद्धि ने कहा-आपको वचनों से मुझे निम्नलिखित शिक्षाएं मिलती हैं-&lt;br /&gt;      1-बास अगर पेंटिंग की बातें करने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि सुपर बास की बीबी आजकल पेंटिंग में दिलचस्पी लेने लगी है।  ऐसी बात समझनी चाहिए, पर उन्हे बोलना नहीं चाहिए। सही बात समझकर भी बोलना सिर्फ वही चाहिए, जिससे अपना फायदा होता हो।&lt;br /&gt;      2-दफ्तर में अगर चपरासी पानी लाने से मना कर दे,तो समझ लेना चाहिए कि दिन पूरे हो गये हैं।&lt;br /&gt;      3-जहां बुद्धिमानी से ज्यादा रिटर्न बेवकूफी के हों, वहां बेवकूफ बनना ही बुद्धिमानी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;          -प्रपंचतंत्र-कथा ग्राउंडबुद्धि और बैकग्राउंडबुद्धि की कहानी&lt;br /&gt;बहुत दिनों पुरानी बात नहीं है।&lt;br /&gt;नोटलोकपुरम् नामक शहर में प्राफिट अनलिमिटेड नामक कंपनी में दो कर्मचारी कार्य करते थे-ग्राउंडबुद्धि और बैकग्राउंडबुद्धि।&lt;br /&gt;      ग्राउंडबुद्धि जैसा कि नाम से जाहिर है-जमीनी और वास्तविक सचाईयों के हिसाब से काम करने वाला बंदा था। वह स्थितियों को ठीक वैसी ही समझता था, जैसी वो होती थीं।&lt;br /&gt;उसका मानना था कि जो है, वह दिखता है, जो दिखता है, वह सच है। इस फंडे के हिसाब से वह इस बंदे की चमचागिरी में जुटता था, जिसका कैबिन दफ्तर में सबसे बड़ा होता था। जिसके पास सबसे ज्यादा टेलीफोन होते थे।&lt;br /&gt;      उधर बैकग्राउंडबुद्धि का मानना था कि जो भी कुछ असली खेल हैं, या असली सच हैं, वो खुले आम सामने दिखायी नहीं देते। खुले आम दिखायी नहीं दे सकते।&lt;br /&gt; सारे महीन किस्म के सत्यों को बहुत कायदे से छिपा-ढाक कर रखा जाता है, ऐसा बैकग्राउंडबुद्धि का मानना था।&lt;br /&gt;      ग्राउंडबुद्धि स्थितियों के हिसाब से काम करता था।&lt;br /&gt;      बैकग्राउंडबुद्धि स्थितियों के पीछे की स्थितियों के हिसाब से काम करता था।&lt;br /&gt;      ग्राउंडबुद्धि का फंडा था कि स्थितियों को गहराई से देखना चाहिए।&lt;br /&gt;      बैकग्राउंडबुद्धि का कहना था कि बैकग्राउंड को बहुत गहराई से सूंघना चाहिए।&lt;br /&gt;      दोनों ही अपने-अपने हिसाब से जीवनयापन कर रहे थे और मंझोले लेवल की मैनेजटमेंट पोजीशनों पर आ गये थे। यहां से ऊपर जाने के लिए दोनों को मालूम था कि सिर्फ काम से काम नहीं चलेगा।&lt;br /&gt;जैसा कि विद्वान लोग जानते हैं कि मंझोले लेवल से ऊपर जाने के लिए काम से अधिक कुछ चाहिए होता है, जिसके दुनियादारी की भाषा में स्मार्टनेस कहा जाता है, पर कतिपय कुंठित लोगों द्वारा चालूपना कहा जाता है।&lt;br /&gt;      खैर साहब दफ्तर में नये बास आये और उनमें से एक बंदा बहुत ही बड़े से कैबिन में काबिज हो गया। बड़े कैबिन में काबिज बंदे की उम्र करीब अठ्ठावन साल थी।&lt;br /&gt;एक बंदा छोटे कैबिन में आया। उसकी स्थिति कुछ खास नहीं दिखायी पड़ती थी।&lt;br /&gt;      ग्राउंडबुद्धि ने पुराने फंडे के हिसाब से बड़े कैबिन वाले की चंपी शुरु कर दी।&lt;br /&gt;      ग्राउंडबुद्धि ने बड़े कैबिन के हल्ले में आने से इनकार कर दिया और बड़े कैबिनधारी की चंपी शुरु नहीं की।&lt;br /&gt;      कुल मिलाकर बैकग्राउंडबुद्धि ने बैकग्राउंड भांपना शुरु किया।&lt;br /&gt;      ग्राऊंडबुद्धि ने देखा कि-बड़े कैबिन वाला बहुत सारी मीटिंग करता है, अपने से जूनियर कर्मचारियों के साथ।&lt;br /&gt;      बैकग्राउंडबुद्धि ने देखा- छोटे कैबिन वाला आकर ढेर सारे नोट बनाता है, और फिर वह चल देता है, सुपर बास के साथ मीटिंग करने।&lt;br /&gt;      ग्राउंडबुद्धि ने देखा-बड़े कैबिन वाला तमाम बातें कहता है, उसकी बातें कोई सीरियसली नहीं लेता।&lt;br /&gt;1&lt;br /&gt;      बैकग्राउंडबुद्धि ने देखा-छोटे कैबिन वाला कहता कम था, लिखता कम था। और सुपर बास के साथ मीटिंग बहुत लंबी करता था। और वह देर रात तक दफ्तर में बैठा रहता था।&lt;br /&gt;      छोटे कैबिन वाला क्या लिखता था, यह ताड़ने की कोशिश में उसे पता चला कि वह रोज दफ्तर के सारे कर्मचारियों के बारे में नोट बनाया करता था, जिसमें कर्मचारियों द्वारा की गयी गलतियों का अति-विस्तृत ब्यौरा होता था। उसे समझ में आया कि क्यों एक बार सुपर बास ने उससे एक बार पूछा था कि आठ अक्तूबर को तुम सत्रह मिनट लेट क्यों आये थे।&lt;br /&gt;      बैकग्राउंडबुद्धि लग गया फिर छोटे कैबिनवाले की चंपी करने में।&lt;br /&gt;      ग्राउंडबुद्धि  ने उसका मजाक उड़ाते हुए कहा-क्यों बेकार में गलत जगह मेहनत कर रहे हो। जिस तरह से बंजर धरती पर की गयी सिंचाई के रिजल्ट नहीं आते, उसी तरह से गलत जगह की गयी चमचाई के रिजल्ट नहीं आते। सो हे मित्र अपनी चमचाई का निवेश कायदे से किसी और जगह करे।&lt;br /&gt;      इस पर बैकग्राउंडबुद्धि ने कहा-हे मित्र शेयर बाजार की तरह चमचई के बाजार में भी मोटा मुनाफा उन कारोबारियो को ही होती है, जो आज के छोटे शेयर में रकम लगाते हैं, फिर जब उन शेयरों की वैल्यू बढ़ जाती है, तो मौका-मुकाम देखकर उनसे मोटी रकम कमाते हैं।&lt;br /&gt;      खैर साहब, कुछ ही दिनों में दफ्तर में देखा गया कि सुपर बास के साथ तमाम मीटिगों में छोटे कैबिन वाला बहुत खुसुर-पुसुरवाले अंदाज में बास के कान में बात करने लगा।&lt;br /&gt;उधर बड़े कैबिन वाले को बास कहते थे -जी आप अपने विचार मुझे लिखकर दे दिया कीजिये। अभी मेरे पास टाइम नहीं है, आपके साथ पर्सनल बातचीत का।&lt;br /&gt;      दफ्तर में देखा गया कि बड़े कैबिन वाले साहब अपने जूनियरों को बिठाकर पुराने संस्मरण सुनाने लगे।&lt;br /&gt;      उधर छोटे कैबिन वाले साहब, नोट पर नोट लिखकर ऊपर पहुंचाने लगे।&lt;br /&gt;      एक दिन बड़े कैबिन वाले रिटायर हो गये और उसके कैबिन में छोटे कैबिन वाले आ गये और उन्हे दफ्तर का नया चीफ बना दिया गया।&lt;br /&gt;      नये चीफ ने सबसे पहले ग्राउंडबुद्धि का ट्रांसफर तिरुअनंतपुरम् कर दिया और  बैकग्राउंडबुद्धि को अपना आफीसर आन स्पेशल ड्यूटी बना दिया। तिरुअनंतपुरम् के लिए जब ग्राउंडबुद्धि सामान बांध रहा था, तो बैकग्राउंडबुद्धि ने उससे कहा। हे मूर्ख तूने बैकग्राउंड नहीं समझा, तब ही तेरी यह दशा हो रही है। तुझे समझना चाहिए था-&lt;br /&gt;1-जो मैनेजर अपने जूनियरों के साथ ज्यादा टाइम बिताता है और सुपर बास के साथ नहीं, उसकी असली हैसियत कुछ भी नहीं है, भले ही उसका कैबिन चाहे जितना बड़ा हो।&lt;br /&gt;2-सुपर बास को पूरे दफ्तर की लिखित रिपोर्ट देने वाला सुपर बास का प्रिय खुद-ब-खुद हो जाता है।&lt;br /&gt;3-जब किसी बंदे का अधिकतर टाइम सिर्फ पुराने संस्मरण सुनाने में जाये, तो समझ लेना चाहिए कि उसके मरण के दिन करीब आ गये हैं।&lt;br /&gt;4-सुपरबास जिसके साथ खुसर-पुसर के अंदाज में बात करे, उसे परम वीआईपी माना जाना चाहिए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/14341775-113734705845351833?l=prapanchtantra.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://prapanchtantra.blogspot.com/feeds/113734705845351833/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=14341775&amp;postID=113734705845351833' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/14341775/posts/default/113734705845351833'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/14341775/posts/default/113734705845351833'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://prapanchtantra.blogspot.com/2006/01/1-1-2-3-4-1-2.html' title=''/><author><name>alokpuranik</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02765351960880619893</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='16' height='16' src='http://img2.blogblog.com/img/b16-rounded.gif'/></author><thr:total>1</thr:total></entry></feed>
